| है अजब हाल ये ज़माने का | |
| याद भी तौर है भुलाने का | |
| पसंद आया बहुत हमें पेशा | |
| ख़ुद ही अपने घरों को ढाने का | |
| काश हम को भी हो नसीब कभी | |
| ऐश-ए-दफ़्तर में गुनगुनाने का | |
| आसमाँ है ख़मोशी-ए-जावेद | |
| मैं भी अब लब नहीं हिलाने का | |
| जान क्या अब तिरा पियाला-ए-नाफ़ | |
| नश्शा मुझ को नहीं पिलाने का | |
| शौक़ है इस दिल-ए-दरिंदा को | |
| आप के होंट काट खाने का | |
| इतना नादिम हुआ हूँ ख़ुद से कि मैं | |
| अब नहीं ख़ुद को आज़माने का | |
| क्या कहूँ जान को बचाने मैं | |
| 'जौन' ख़तरा है जान जाने का | |
| ये जहाँ 'जौन' इक जहन्नुम है | |
| याँ ख़ुदा भी नहीं है आने का | |
| ज़िंदगी एक फ़न है लम्हों को | |
| अपने अंदाज़ से गँवाने का | |
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