| कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है ! |
| मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है !! |
| मैं तुझसे दूर कैसा हूँ , तू मुझसे दूर कैसी है ! |
| ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है !! |
| मोहब्बत एक अहसासों की पावन सी कहानी है ! |
| कभी कबिरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है !! |
| यहाँ सब लोग कहते हैं, मेरी आंखों में आँसू हैं ! |
| जो तू समझे तो मोती है, जो ना समझे तो पानी है !! |
| बदलने को तो इन आंखों के मंजर कम नहीं बदले, |
| तुम्हारी याद के मौसम हमारे गम नहीं बदले |
| तुम अगले जन्म में हमसे मिलोगी तब तो मानोगी, |
| जमाने और सदी की इस बदल में हम नहीं बदले |
| हमें मालूम है दो दिल जुदाई सह नहीं सकते |
| मगर रस्मे-वफ़ा ये है कि ये भी कह नहीं सकते |
| जरा कुछ देर तुम उन साहिलों कि चीख सुन भर लो |
| जो लहरों में तो डूबे हैं, मगर संग बह नहीं सकते |
| समंदर पीर का अन्दर है, लेकिन रो नही सकता ! |
| यह आँसू प्यार का मोती है, इसको खो नही सकता !! |
| मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना, मगर सुन ले ! |
| जो मेरा हो नही पाया, वो तेरा हो नही सकता !! |
| मिले हर जख्म को मुस्कान को सीना नहीं आया |
| अमरता चाहते थे पर ज़हर पीना नहीं आया |
| तुम्हारी और मेरी दस्ता में फर्क इतना है |
| मुझे मरना नहीं आया तुम्हे जीना नहीं आया |
| पनाहों में जो आया हो तो उस पर वार करना क्या |
| जो दिल हारा हुआ हो उस पर फिर अधिकार करना क्या |
| मुहब्बत का मज़ा तो डूबने की कश्मकश में है |
| हो गर मालूम गहराई तो दरिया पार करना क्या |
| जहाँ हर दिन सिसकना है जहाँ हर रात गाना है |
| हमारी ज़िन्दगी भी इक तवायफ़ का घराना है |
| बहुत मजबूर होकर गीत रोटी के लिखे हमने |
| तुम्हारी याद का क्या है उसे तो रोज़ आना है |
| तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है समझता हूँ |
| तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है समझता हूँ |
| तुम्हे मैं भूल जाऊँगा ये मुमकिन है नहीं लेकिन |
| तुम्ही को भूलना सबसे ज़रूरी है समझता हूँ |
| मैं जब भी तेज़ चलता हूँ नज़ारे छूट जाते हैं |
| कोई जब रूप गढ़ता हूँ तो साँचे टूट जाते हैं |
| मैं रोता हूँ तो आकर लोग कँधा थपथपाते हैं |
| मैं हँसता हूँ तो अक़्सर लोग मुझसे रूठ जाते हैं |
| सदा तो धूप के हाथों में ही परचम नहीं होता |
| खुशी के घर में भी बोलों कभी क्या गम नहीं होता |
| फ़क़त इक आदमी के वास्तें जग छोड़ने वालो |
| फ़क़त उस आदमी से ये ज़माना कम नहीं होता। |
| हमारे वास्ते कोई दुआ मांगे, असर तो हो |
| हकीकत में कहीं पर हो न हो आँखों में घर तो हो |
| तुम्हारे प्यार की बातें सुनाते हैं ज़माने को |
| तुम्हें खबरों में रखते हैं मगर तुमको खबर तो हो |
| बताऊँ क्या मुझे ऐसे सहारों ने सताया है, |
| नदी तो कुछ नहीं बोली किनारों ने सताया है |
| सदा ही शूल मेरी राह से खुद हट गये लेकिन, |
| मुझे तो हर घड़ी हर पल बहारों ने सताया है। |
| हर एक नदिया के होंठों पे समंदर का तराना है, |
| यहाँ फरहाद के आगे सदा कोई बहाना है ! |
| वही बातें पुरानी थीं, वही किस्सा पुराना है, |
| तुम्हारे और मेरे बीच में फिर से जमाना है |
| मेरा प्रतिमान आंसू मे भिगो कर गढ़ लिया होता, |
| अकिंचन पाँव तब आगे तुम्हारा बढ़ लिया होता, |
| मेरी आँखों मे भी अंकित समर्पण की रिचाएँ थीं, |
| उन्हें कुछ अर्थ मिल जाता जो तुमने पढ़ लिया होता |
| कोई खामोश है इतना, बहाने भूल आया हूँ |
| किसी की इक तरनुम में, तराने भूल आया हूँ |
| मेरी अब राह मत तकना कभी ए आसमां वालो |
| मैं इक चिड़िया की आँखों में, उड़ाने भूल आया हूँ |
| हमें दो पल सुरूरे-इश्क़ में मदहोश रहने दो |
| ज़ेहन की सीढियाँ उतरो, अमां ये जोश रहने दो |
| तुम्ही कहते थे "ये मसले, नज़र सुलझी तो सुलझेंगे", |
| नज़र की बात है तो फिर ये लब खामोश रहने दो |
| मैं उसका हूँ वो इस अहसास से इनकार करता है |
| भरी महफ़िल में भी, रुसवा हर बार करता है |
| यकीं है सारी दुनिया को, खफा है मुझसे वो लेकिन |
| मुझे मालूम है फिर भी मुझी से प्यार करता है |
| अभी चलता हूँ, रस्ते को मैं मंजिल मान लूँ कैसे |
| मसीहा दिल को अपनी जिद का कातिल मान लूँ कैसे |
| तुम्हारी याद के आदिम अंधेरे मुझ को घेरे हैं |
| तुम्हारे बिन जो बीते दिन उन्हें दिन मान लूँ कैसे |
| भ्रमर कोई कुमुदुनी पर मचल बैठा तो हंगामा! |
| हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा!! |
| अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का! |
| मैं किस्से को हकीक़त में बदल बैठा तो हंगामा!! |
| कभी कोई जो खुलकर हंस लिया दो पल तो हंगामा |
| कोई ख़्वाबों में आकर बस लिया दो पल तो हंगामा |
| मैं उससे दूर था तो शोर था साजिश है, साजिश है |
| उसे बाहों में खुलकर कस लिया दो पल तो हंगामा |
| जब आता है जीवन में खयालातों का हंगामा |
| ये जज्बातों, मुलाकातों हंसी रातों का हंगामा |
| जवानी के क़यामत दौर में यह सोचते हैं सब |
| ये हंगामे की रातें हैं या है रातों का हंगामा |
| कल्म को खून में खुद के डुबोता हूँ तो हंगामा |
| गिरेबां अपना आंसू में भिगोता हूँ तो हंगामा |
| नही मुझ पर भी जो खुद की खबर वो है जमाने पर |
| मैं हंसता हूँ तो हंगामा, मैं रोता हूँ तो हंगामा |
| इबारत से गुनाहों तक की मंजिल में है हंगामा |
| ज़रा-सी पी के आये बस तो महफ़िल में है हंगामा |
| कभी बचपन, जवानी और बुढापे में है हंगामा |
| जेहन में है कभी तो फिर कभी दिल में है हंगामा |
| हुए पैदा तो धरती पर हुआ आबाद हंगामा |
| जवानी को हमारी कर गया बर्बाद हंगामा |
| हमारे भाल पर तकदीर ने ये लिख दिया जैसे |
| हमारे सामने है और हमारे बाद हंगामा |
| ये उर्दू बज़्म है और मैं तो हिंदी माँ का जाया हूँ |
| ज़बानें मुल्क़ की बहनें हैं ये पैग़ाम लाया हूँ |
| मुझे दुगनी मुहब्बत से सुनो उर्दू ज़बाँ वालों |
| मैं हिंदी माँ का बेटा हूँ, मैं घर मौसी के आया हूँ |
| स्वयं से दूर हो तुम भी, स्वयं से दूर हैं हम भी |
| बहुत मशहुर हो तुम भी, बहुत मशहुर हैं हम भी |
| बड़े मगरूर हो तुम भी, बड़े मगरूर हैं हम भी |
| अत: मजबूर हो तुम भी, अत: मजबूर हैं हम भी |
| हरेक टूटन, उदासी, ऊब आवारा ही होती है, |
| इसी आवारगी में प्यार की शुरुआत होती है, |
| मेरे हँसने को उसने भी गुनाहों में गिना जिसके, |
| हरेक आँसू को मैंने यूँ संभाला जैसे मोती है |
| कहीं पर जग लिए तुम बिन, कहीं पर सो लिए तुम बिन |
| भरी महफिल में भी अक्सर, अकेले हो लिए तुम बिन |
| ये पिछले चंद वर्षों की कमाई साथ है अपने |
| कभी तो हंस लिए तुम बिन, कभी तो रो लिए तुम बिन |
| हमें दिल में बसाकर अपने घर जाएं तो अच्छा हो |
| हमारी बात सुनलें और ठहर जाएं तो अच्छा हो |
| ये सारी शाम जाब नज़रों ही नज़रो में बिता दी है |
| तो कुछ पल और आँखों में गुज़र जाएँ तो अच्छा हो |
| बस्ती बस्ती घोर उदासी पर्वत पर्वत खालीपन, |
| मन हीरा बेमोल लुट गया रोता घिस घिस री तातन चन्दन |
| इस धरती से उस अम्बर तक दो ही चीज गजब की हैं, |
| एक तो तेरा भोलापन है एक मेरा दीवानापन |
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