| सम्बन्धों को अनुबन्धों को परिभाषाएँ देनी होंगी |
| होठों के संग नयनों को कुछ भाषाएँ देनी होंगी |
| हर विवश आँख के आँसू को |
| यूँ ही हँस हँस पीना होगा |
| मै कवि हूँ जब तक पीड़ा है |
| तब तक मुझको जीना होगा |
| मनमोहन के आकर्षण मे भूली भटकी राधाओं की |
| हर अभिशापित वैदेही को पथ मे मिलती बाधाओं की |
| दे प्राण देह का मोह छुड़ाओं वाली हाड़ा रानी की |
| मीराओं की आँखों से झरते गंगाजल से पानी की |
| मुझको ही कथा सँजोनी है, |
| मुझको ही व्यथा पिरोनी है |
| स्मृतियाँ घाव भले ही दें |
| मुझको उनको सीना होगा |
| मै कवि हूँ जब तक पीड़ा है |
| तब तक मुझको जीना होगा |
| जो सूरज को पिघलाती है व्याकुल उन साँसों को देखूँ |
| या सतरंगी परिधानों पर मिटती इन प्यासों को देखूँ |
| देखूँ आँसू की कीमत पर मुस्कानों के सौदे होते |
| या फूलों के हित औरों के पथ मे देखूँ काँटे बोते |
| इन द्रौपदियों के चीरों से |
| हर क्रौंच-वधिक के तीरों से |
| सारा जग बच जाएगा पर |
| छलनी मेरा सीना होगा |
| मै कवि हूँ जब तक पीड़ा है |
| तब तक मुझको जीना होगा |
| कलरव ने सूनापन सौंपा मुझको अभाव से भाव मिले |
| पीड़ाओं से मुस्कान मिली हँसते फूलों से घाव मिले |
| सरिताओं की मन्थर गति मे मैंने आशा का गीत सुना |
| शैलों पर झरते मेघों में मैने जीवन-संगीत सुना |
| पीड़ा की इस मधुशाला में |
| आँसू की खारी हाला में |
| तन-मन जो आज डुबो देगा |
| वह ही युग का मीना होगा |
| मै कवि हूँ जब तक पीड़ा है |
| तब तक मुझको जीना होगा |
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