| उस ने हम को गुमान में रक्खा | |
| और फिर कम ही ध्यान में रक्खा | |
| क्या क़यामत-नुमू थी वो जिस ने | |
| हश्र उस की उठान में रक्खा | |
| जोशिश-ए-ख़ूँ ने अपने फ़न का हिसाब | |
| एक चुप इक चटान में रक्खा | |
| लम्हे लम्हे की अपनी थी इक शान | |
| तू ने ही एक शान में रक्खा | |
| हम ने पैहम क़ुबूल-ओ-रद कर के | |
| उस को एक इम्तिहान में रक्खा | |
| तुम तो उस याद की अमान में हो | |
| उस को किस की अमान में रक्खा | |
| अपना रिश्ता ज़मीं से ही रक्खो | |
| कुछ नहीं आसमान में रक्खा | |
0 Comments