शाम थी और बर्ग-ओ-गुल शल थे मगर सबा भी थी - जौन एलिया

 

 

 




शाम थी और बर्ग-ओ-गुल शल थे मगर सबा भी थी

एक अजीब सुकूत था एक अजब सदा भी थी



एक मलाल का सा हाल महव था अपने हाल में

रक़्स-ओ-नवा थे बे-तरफ़ महफ़िल-ए-शब बपा भी थी



सामेआ-ए-सदा-ए-जाँ बे-सरोकार था कि था

एक गुमाँ की दास्ताँ बर-लब नीम-वा भी थी



क्या मह-ओ-साल माजरा एक पलक थी जो मियाँ

बात की इब्तिदा भी थी बात की इंतिहा भी थी



एक सुरूद-ए-रौशनी नीमा-ए-शब का ख़्वाब था

एक ख़मोश तीरगी सानेहा-आश्ना भी थी



दिल तिरा पेशा-ए-गिला-ए-काम ख़राब कर गया

वर्ना तो एक रंज की हालत-ए-बे-गिला भी थी



दिल के मुआ'मले जो थे उन में से एक ये भी है

इक हवस थी दिल में जो दिल से गुरेज़-पा भी थी



बाल-ओ-पर-ए-ख़याल को अब नहीं सम्त-ओ-सू नसीब

पहले थी इक अजब फ़ज़ा और जो पुर-फ़ज़ा भी थी



ख़ुश्क है चश्मा-सार-ए-जाँ ज़र्द है सब्ज़ा-ज़ार-ए-दिल

अब तो ये सोचिए कि याँ पहले कभी हवा भी थी


 

 

 

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