| क्या यक़ीं और क्या गुमाँ चुप रह | |
| शाम का वक़्त है मियाँ चुप रह | |
| हो गया क़िस्सा-ए-वजूद तमाम | |
| है अब आग़ाज़-ए-दास्ताँ चुप रह | |
| मैं तो पहले ही जा चुका हूँ कहीं | |
| तू भी जानाँ नहीं यहाँ चुप रह | |
| तू अब आया है हाल में अपने | |
| जब ज़मीं है न आसमाँ चुप रह | |
| तू जहाँ था जहाँ जहाँ था कभी | |
| तू भी अब तो नहीं वहाँ चुप रह | |
| ज़िक्र छेड़ा ख़ुदा का फिर तू ने | |
| याँ है इंसाँ भी राएगाँ चुप रह | |
| सारा सौदा निकाल दे सर से | |
| अब नहीं कोई आस्ताँ चुप रह | |
| अहरमन हो ख़ुदा हो या आदम | |
| हो चुका सब का इम्तिहाँ चुप रह | |
| दरमियानी ही अब सभी कुछ है | |
| तू नहीं अपने दरमियाँ चुप रह | |
| अब कोई बात तेरी बात नहीं | |
| नहीं तेरी तिरी ज़बाँ चुप रह | |
| है यहाँ ज़िक्र-ए-हाल-ए-मौजूदाँ | |
| तू है अब अज़-गुज़िश्तगाँ चुप रह | |
| हिज्र की जाँ-कनी तमाम हुई | |
| दिल हुआ 'जौन' बे-अमाँ चुप रह | |
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