एक गुमाँ का हाल है और फ़क़त गुमाँ में है - जौन एलिया

 

 

 




एक गुमाँ का हाल है और फ़क़त गुमाँ में है

किस ने अज़ाब-ए-जाँ सहा कौन अज़ाब-ए-जाँ में है



लम्हा-ब-लम्हा दम-ब-दम आन-ब-आन रम-ब-रम

मैं भी गुज़िश्तगाँ में हूँ तू भी गुज़िश्तगाँ में है



आदम-ओ-ज़ात-ए-किब्रिया कर्ब में हैं जुदा जुदा

क्या कहूँ उन का माजरा जो भी है इम्तिहाँ में है



शाख़ से उड़ गया परिंद है दिल-ए-शाम-ए-दर्द-मंद

सहन में है मलाल सा हुज़्न सा आसमाँ में है



ख़ुद में भी बे-अमाँ हूँ मैं तुझ में भी बे-अमाँ हूँ मैं

कौन सहेगा उस का ग़म वो जो मिरी अमाँ में है



कैसा हिसाब क्या हिसाब हालत-ए-हाल है अज़ाब

ज़ख़्म नफ़स नफ़स में है ज़हर ज़माँ ज़माँ में है



उस का फ़िराक़ भी ज़ियाँ उस का विसाल भी ज़ियाँ

एक अजीब कश्मकश हल्क़ा-ए-बे-दिलाँ में है



बूद-ओ-नबूद का हिसाब मैं नहीं जानता मगर

सारे वजूद की नहीं मेरे अदम की हाँ में है


 

 

 

 

 

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