| किसी से कोई ख़फ़ा भी नहीं रहा अब तो | |
| गिला करो कि गिला भी नहीं रहा अब तो | |
| वो काहिशें हैं कि ऐश-ए-जुनूँ तो क्या या'नी | |
| ग़ुरूर-ए-ज़ेहन-ए-रसा भी नहीं रहा अब तो | |
| शिकस्त-ए-ज़ात का इक़रार और क्या होगा | |
| कि इद्दा-ए-वफ़ा भी नहीं रहा अब तो | |
| चुने हुए हैं लबों पर तिरे हज़ार जवाब | |
| शिकायतों का मज़ा भी नहीं रहा अब तो | |
| हूँ मुब्तला-ए-यक़ीं मेरी मुश्किलें मत पूछ | |
| गुमान-ए-उक़्दा-कुशा भी नहीं रहा अब तो | |
| मिरे वजूद का अब क्या सवाल है या'नी | |
| मैं अपने हक़ में बुरा भी नहीं रहा अब तो | |
| यही अतिय्या-ए-सुब्ह-ए-शब-ए-विसाल है क्या | |
| कि सेहर-ए-नाज़-ओ-अदा भी नहीं रहा अब तो | |
| यक़ीन कर जो तिरी आरज़ू में था पहले | |
| वो लुत्फ़ तेरे सिवा भी नहीं रहा अब तो | |
| वो सुख वहाँ कि ख़ुदा की हैं बख़्शिशें क्या क्या | |
| यहाँ ये दुख कि ख़ुदा भी नहीं रहा अब तो | |
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