कू-ए-जानाँ में और क्या माँगो - जौन एलिया

 

 





कू-ए-जानाँ में और क्या माँगो

हालत-ए-हाल यक सदा माँगो



हर-नफ़स तुम यक़ीन-ए-मुनइम से

रिज़्क़ अपने गुमान का माँगो



है अगर वो बहुत ही दिल नज़दीक

उस से दूरी का सिलसिला माँगो



दर-ए-मतलब है क्या तलब-अंगेज़

कुछ नहीं वाँ सो कुछ भी जा माँगो



गोशा-गीर-ए-ग़ुबार-ए-ज़ात हूँ में

मुझ में हो कर मिरा पता माँगो



मुनकिरान-ए-ख़ुदा-ए-बख़शिंदा

उस से तो और इक ख़ुदा माँगो



उस शिकम-रक़्स-गर के साइल हो

नाफ़-प्याले की तुम अता माँगो



लाख जंजाल माँगने में हैं

कुछ न माँगो फ़क़त दुआ माँगो


 

 

 

 

 

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