| दिल गुमाँ था गुमानियाँ थे हम | |
| हाँ मियाँ दासतानियाँ थे हम | |
| हम सुने और सुनाए जाते थे | |
| रात भर की कहानियाँ थे हम | |
| जाने हम किस की बूद का थे सुबूत | |
| जाने किस की निशानियाँ थे हम | |
| छोड़ते क्यूँ न हम ज़मीं अपनी | |
| आख़िरश आसमानियाँ थे हम | |
| ज़र्रा भर भी न थी नुमूद अपनी | |
| और फिर भी जहानियाँ थे हम | |
| हम न थे एक आन के भी मगर | |
| जावेदाँ जाविदानियाँ थे हम | |
| रोज़ इक रन था तीर-ओ-तरकश बिन | |
| थे कमीं और कमानियाँ थे हम | |
| अर्ग़वानी था वो पियाला-ए-नाफ़ | |
| हम जो थे अर्ग़वानियाँ थे हम | |
| नार-ए-पिस्तान थी वो क़त्ताला | |
| और हवस-दरमियानियाँ थे हम | |
| ना-गहाँ थी इक आन आन कि थी | |
| हम जो थे नागहानियाँ थे हम | |
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