क्या ये आफ़त नहीं अज़ाब नहीं - जौन एलिया

 

 




क्या ये आफ़त नहीं अज़ाब नहीं

दिल की हालत बहुत ख़राब नहीं



बूद पल पल की बे-हिसाबी है

कि मुहासिब नहीं हिसाब नहीं



ख़ूब गाव बजाओ और पियो

इन दिनों शहर में जनाब नहीं



सब भटकते हैं अपनी गलियों में

ता-ब-ख़ुद कोई बारयाब नहीं



तू ही मेरा सवाल अज़ल से है

और साजन तिरा जवाब नहीं



हिफ़्ज़ है शम्स-ए-बाज़ग़ा मुझ को

पर मयस्सर वो माहताब नहीं



तुझ को दिल-दर्द का नहीं एहसास

सो मिरी पिंडलियों को दाब नहीं



नहीं जुड़ता ख़याल को भी ख़याल

ख़्वाब में भी तो कोई ख़्वाब नहीं



सतर-ए-मू उस की ज़ेर-ए-नाफ़ की हाए

जिस की चाक़ू-ज़नों को ताब नहीं


 

 

 

 

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