| तिफ़्लान-ए-कूचा-गर्द के पत्थर भी कुछ नहीं | |
| सौदा भी एक वहम है और सर भी कुछ नहीं | |
| मैं और ख़ुद को तुझ से छुपाऊँगा या'नी मैं | |
| ले देख ले मियाँ मिरे अंदर भी कुछ नहीं | |
| बस इक गुबार-ए-वहम है इक कूचा-गर्द का | |
| दीवार-ए-बूद कुछ नहीं और दर भी कुछ नहीं | |
| ये शहर-दार-ओ-मुहतसिब-ओ-मौलवी ही क्या | |
| पीर-ए-मुग़ान-ओ-रिन्द-ओ-क़लंदर भी कुछ नहीं | |
| शैख़-ए-हराम-लुक़्मा की पर्वा है क्यूँ तुम्हें | |
| मस्जिद भी उस की कुछ नहीं मिम्बर भी कुछ नहीं | |
| मक़्दूर अपना कुछ भी नहीं इस दयार में | |
| शायद वो जब्र है कि मुक़द्दर भी कुछ नहीं | |
| जानी मैं तेरे नाफ़-पियाले पे हूँ फ़िदा | |
| ये और बात है तिरा पैकर भी कुछ नहीं | |
| ये शब का रक़्स-ओ-रंग तो क्या सुन मिरी कुहन | |
| सुब्ह-ए-शिताब-कोश को दफ़्तर भी कुछ नहीं | |
| बस इक ग़ुबार तूर-ए-गुमाँ का है तह-ब-तह | |
| या'नी नज़र भी कुछ नहीं मंज़र भी कुछ नहीं | |
| है अब तो एक जाल सुकून-ए-हमेशगी | |
| पर्वाज़ का तो ज़िक्र ही क्या पर भी कुछ नहीं | |
| कितना डरावना है ये शहर-ए-नबूद-ओ-बूद | |
| ऐसा डरावना कि यहाँ डर भी कुछ नहीं | |
| पहलू में है जो मेरे कहीं और है वो शख़्स | |
| या'नी वफ़ा-ए-अहद का बिस्तर भी कुछ नहीं | |
| निस्बत में उन की जो है अज़िय्यत वो है मगर | |
| शह-रग भी कोई शय नहीं और सर भी कुछ नहीं | |
| याराँ तुम्हें जो मुझ से गिला है तो किस लिए | |
| मुझ को तो ए'तिराज़ ख़ुदा पर भी कुछ नहीं | |
| गुज़रेगी 'जौन' शहर में रिश्तों के किस तरह | |
| दिल में भी कुछ नहीं है ज़बाँ पर भी कुछ नहीं | |
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