| सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई | |
| क्यूँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई | |
| साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं | |
| रिश्तों में ढूँढता है तो ढूँडा करे कोई | |
| तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं | |
| ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई | |
| दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी | |
| अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई | |
| मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हूँ ख़राब | |
| मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई | |
| ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है | |
| ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई | |
| हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ | |
| आख़िर मिरे मिज़ाज में क्यूँ दख़्ल दे कोई | |
| इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र | |
| काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई | |
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