| तुम गये
तुम्हारे साथ गया, |
| अल्हड़
अन्तर का भोलापन। |
| कच्चे-सपनों
की नींद और, |
| आँखों
का सहज सलोनापन। |
|
| जीवन की
कोरों से दहकीं |
| यौवन की
अग्नि शिखाओं में, |
| तुम अगन
रहे, मैं मगन रहा, |
| घर-बाहर
की बाधाओं में, |
| जो
रूप-रूप भटकी होगी, |
| वह पावन
आस तुम्हारी थी। |
| जो
बूंद-बूंद तरसी होगी, |
| वह आदिम
प्यास तुम्हारी थी। |
| तुम तो
मेरी सारी प्यासे |
| पनघट तक
लाकर लौट गये, |
| अब
निपट-अकेलेपन पर हँस देता |
| निर्मम
जल का दर्पण। |
| तुम गये
तुम्हारे साथ गया |
| अल्हड़
अन्तर का भोलापन |
| यश
-वैभव के ये ठाठ-बाट, |
| अब सभी
झमेले लगते हैं। |
| पथ
कितना भी हो भीड़ भरा |
| दो पाँव
अकेले लगते है |
| हल करते
-करते उलझ गया, |
| भोली सी
एक पहेली को, |
| चुपचाप
देखता रहता हूँ, |
| सोने से
मॅढ़ी हथेली को। |
| जितना
रोता तुम छोड़ गये, |
| उससे
ज्यादा हँसता हूँ अब |
| पर
इन्ही ठहाकों की गूजों में, |
| बज उठता
है खालीपन |
|
| तुम गये
तुम्हारे साथ गया, |
| अल्हड़
अन्तर का भोलापन । |
| कच्चे-सपनों
की नींद और, |
| आँखों
का सहज सलोनापन। |
| तुम गये
तुम्हारे साथ गया... |
<< Prev Home Poetry List Next >>
0 Comments