| तुम गए
क्या, शहर सूना कर गये, |
| दर्द का
आकार दूना कर गये। |
|
| जानता
हूँ फिर सुनाओगे मुझे मौलिक कथाएँ, |
| शहर भर
की सूचनाएँ, उम्र भर की
व्यस्तताएँ; |
| पर
जिन्हें अपना बनाकर, भूल जाते
हो सदा तुम, |
| वे
तुम्हारे बिन, तुम्हारी वेदना
किसको सुनाएँ; |
| फिर
मेरा जीवन, उदासी का नमूना कर
गये, |
| तुम गए
क्या, शहर सूना कर गये। |
|
| मैं
तुम्हारी याद के मीठे तराने बुन रहा था, |
| वक्त
खुद जिनको मगन हो, सांस थामे
सुन रहा था; |
| तुम अगर
कुछ देर रूकते तो तुम्हें मालूम होता, |
| किस तरह
बिखरे पलों में मैं बहाने चुन रहा था; |
| रात भर
हाँ-हाँ किया पर प्रात में ना कर गये, |
| तुम गए
क्या, शहर सूना कर गये। |
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