| चाँद ने कहा है, एक बार फिर चकोर से, |
| 'इस जनम में भी जलोगे तुम ही मेरी ओर से।' |
| हर जनम का अपना चाँद है, चकोर है अलग, |
| यूँ जनम-जनम का एक ही मछेरा है मगर, |
| हर जनम की मछलियाँ अलग हैं डोर है अलग, |
| डोर ने कहा है मछलियों की पोर-पोर से, |
| 'इस जनम में भी बिंधोगी तुम ही मेरी ओर से,' |
| चाँद ने कहा है, एक बार फिर चकोर से। |
| 'इस जनम में भी जलोगे तुम ही मेरी ओर से।' |
| है अनंत सर्ग यूँ और कथा ये विचित्र है, |
| पंक से जनम लिया पर कमल पवित्र है, |
| यूँ जनम-जनम का एक ही वो चित्रकार है, |
| हर जनम की तूलिका अलग, अलग ही चित्र है, |
| ये कहा है तूलिका ने, चित्र के चरित्र से, |
| 'इस जनम में भी सजोगे तुम ही मेरी कोर से,' |
| चाँद ने कहा है, एक बार फिर चकोर से। |
| 'इस जनम में भी जलोगे तुम ही मेरी ओर से।' |
| हर जनम के फूल हैं अलग, हैं तितलियाँ अलग, |
| हर जनम की शोखियाँ अलग, हैं सुर्खियाँ अलग, |
| ध्वँस और सृजन का एक राग है अमर, मगर |
| हर जनम का आशियाँ अलग, है बिजलियाँ अलग, |
| नीड़ से कहा है बिजलियों ने जोर-शोर से, |
| 'इस जनम में भी मिटोगे तुम ही मेरी ओर से,' |
| चाँद ने कहा है, एक बार फिर चकोर से, |
| 'इस जनम में भी जलोगे तुम ही मेरी ओर से।' |
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