| जब भी मुँह ढक लेता हूँ, |
| तेरे जुल्फों के छाँव में, |
| कितने गीत उतर आते है, |
| मेरे मन के गाँव में |
| एक गीत पलकों पे लिखना, |
| एक गीत होंठो पे लिखना, |
| यानि सारी गीत ह्रदय की, |
| मीठी से चोटों पर लिखना, |
| जैसे चुभ जाता कोई काँटा नंगे पाँव में, |
| ऐसे गीत उतर आता, मेरे मन के गाँव में |
| पलकें बंद हुई तो जैसे, |
| धरती के उन्माद सो गये, |
| पलकें अगर उठी तो जैसे, |
| बिन बोले संवाद हो गये, |
| जैसे धुप, चुनरिया ओढ़े, आ बैठी हो छाँव में, |
| ऐसे गीत उतर आता, मेरे मन के गाँव में |
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