मेरे मन के गाँव में - कुमार विश्वास

 

जब भी मुँह ढक लेता हूँ,
तेरे जुल्फों के छाँव में,
कितने गीत उतर आते है,
मेरे मन के गाँव में

एक गीत पलकों पे लिखना,
एक गीत होंठो पे लिखना,
यानि सारी गीत ह्रदय की,
मीठी से चोटों पर लिखना,
जैसे चुभ जाता कोई काँटा नंगे पाँव में,
ऐसे गीत उतर आता, मेरे मन के गाँव में

पलकें बंद हुई तो जैसे,
धरती के उन्माद सो गये,
पलकें अगर उठी तो जैसे,
बिन बोले संवाद हो गये,
जैसे धुप, चुनरिया ओढ़े, आ बैठी हो छाँव में,
ऐसे गीत उतर आता, मेरे मन के गाँव में

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