| पंछी ने खोल दिए पर |
| अब चाहे लीले अम्बर... |
| कितने तूफ़ानों की संजीवनी सिमटी है |
| इन छोटे-छोटे दो पंखों की आड़ में |
| चन्दा की आंखों में सूरज के सपने हैं |
| मनवा का हिरना ज्यों किस्मत की बाड़ में |
| मार्ग में सिरजा है घर |
| अब चाहे लीले अम्बर... |
| प्रहरों अंधे तम का अनाचार सहकर जब |
| कलरव जागा तो सब भ्रम-भय भी भाग गया |
| जब निरवाणी-तिथि निश्चित है उषा में तो |
| अरुण-शिखा का विस्मृत-पौरुष भी जाग गया |
| मुक्त हुआ अंतर से डर |
| अब चाहे लीले अम्बर... |
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