पंछी ने खोल दिए पर - कुमार विश्वास

 

 


पंछी ने खोल दिए पर
अब चाहे लीले अम्बर...

कितने तूफ़ानों की संजीवनी सिमटी है
इन छोटे-छोटे दो पंखों की आड़ में
चन्दा की आंखों में सूरज के सपने हैं
मनवा का हिरना ज्यों किस्मत की बाड़ में
मार्ग में सिरजा है घर
अब चाहे लीले अम्बर...

प्रहरों अंधे तम का अनाचार सहकर जब
कलरव जागा तो सब भ्रम-भय भी भाग गया
जब निरवाणी-तिथि निश्चित है उषा में तो
अरुण-शिखा का विस्मृत-पौरुष भी जाग गया
मुक्त हुआ अंतर से डर
अब चाहे लीले अम्बर...


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