| ओ
कल्पवृक्ष की सोनजुही, |
| ओ
अमलताश की अमलकली, |
| धरती के
आतप से जलते, |
| मन पर
छाई निर्मल बदली, |
| मैं
तुमको मधुसदगन्ध युक्त संसार नहीं दे पाऊँगा, |
| तुम
मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा। |
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| तुम
कल्पव्रक्ष का फूल और, |
| मैं
धरती का अदना गायक, |
| तुम
जीवन के उपभोग योग्य, |
| मैं
नहीं स्वयं अपने लायक, |
| तुम
नहीं अधूरी गजल शुभे, |
| तुम शाम
गान सी पावन हो, |
| हिम
शिखरों पर सहसा कौंधी, |
| बिजुरी
सी तुम मनभावन हो, |
| इसलिये
व्यर्थ शब्दों वाला व्यापार नहीं दे पाऊँगा, |
| तुम
मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा। |
|
| तुम जिस
शय्या पर शयन करो, |
| वह
क्षीर सिन्धु सी पावन हो, |
| जिस
आँगन की हो मौलश्री, |
| वह आँगन
क्या व्रन्दावन हो, |
| जिन
अधरों का चुम्बन पाओ, |
| वे अधर
नहीं गंगातट हों, |
| जिसकी
छाया बन साथ रहो, |
| वह
व्यक्ति नहीं वंशीवट हो, |
| पर मैं
वट जैसा सघन छाँह विस्तार नहीं दे पाऊँगा, |
| तुम
मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा। |
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| मै
तुमको चाँद सितारों का, |
| सौंपू
उपहार भला कैसे, |
| मैं
यायावर बंजारा साँधू, |
| सुर
श्रंगार भला कैसे, |
| मै जीवन
के प्रश्नों से नाता तोड तुम्हारे साथ शुभे, |
| बारूद
बिछी धरती पर कर लूँ, |
| दो पल
प्यार भला कैसे, |
| इसलिये
विवष हर आँसू को सत्कार नहीं दे पाऊँगा, |
| तुम
मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा। |
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