| कितने दिन बीत गए, |
| देह की नदी में |
| नहाये हुए |
| सपने की फिसलन के डर जैसा, |
| दीप बुझी देहरी के घर जैसा, |
| जलती लौ नेह चुके दीपक-सा, |
| दिन डूबा वंशी के स्वर जैसा, |
| कितने सुर रीत गए, |
| अंतर का गीत कोई |
| गाए हुए |
| कितने दिन बीत गए। |
| कुछ ऐसा पाना जो जग छूटे |
| मंथन वो जिससे झरना फूटे |
| बिन बांधे बंधने का वो कौशल |
| जो बांधे तो हर बंधन टूटे |
| कितने सुख जीत गए |
| पोर पोर पीड़ा |
| कमाए हुए |
| कितने दिन बीत गए। |
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