| इतनी रंग बिरंगी दुनिया, दो आँखों में कैसे आये, |
| हमसे पूछो इतने अनुभव, एक कंठ से कैसे गाये। |
| ऐसे उजले लोग मिले जो, अंदर से बेहद काले थे, |
| ऐसे चतुर मिले जो मन से सहज सरल भोले-भाले थे। |
| ऐसे धनी मिले जो, कंगालो से भी ज्यादा रीते थे, |
| ऐसे मिले फकीर, जो, सोने के घट में पानी पीते थे। |
| मिले परायेपन से अपने, अपनेपन से मिले पराये, |
| हमसे पूछो इतने अनुभव, एक कंठ से कैसे गाये। |
| इतनी रंग बिरंगी दुनिया, दो आँखों में कैसे आये। |
| जिनको जगत-विजेता समझा, मन के द्वारे हारे निकले, |
| जो हारे-हारे लगते थे, अंदर से ध्रुव- तारे निकले। |
| जिनको पतवारे सौंपी थी, वे भँवरो के सूदखोर थे, |
| जिनको भँवर समझ डरता था, आखिर वही किनारे निकले। |
| वो मंजिल तक क्या पहुंचे, जिनको रास्ता खुद भटकाए। |
| हमसे पूछो इतने अनुभव, एक कंठ से कैसे गाये, |
| इतनी रंग बिरंगी दुनिया, दो आँखों में कैसे आये। |
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