| कल नुमाइश में फिर गीत मेरे बिके |
| और मैं क़ीमतें ले के घर आ गया, |
| कल सलीबों पे फिर प्रीत मेरी चढ़ी |
| मेरी आँखों पे स्वर्णिम धुआँ छा गया। |
| कल तुम्हारी सुधि में भरी गन्ध फिर |
| कल तुम्हारे लिए कुछ रचे छन्द फिर, |
| मेरी रोती सिसकती सी आवाज़ में |
| लोग पाते रहे मौन आनंद फिर, |
| कल तुम्हारे लिए आँख फिर नम हुई |
| कल अनजाने ही महफ़िल में मैं छा गया, |
| कल नुमाइश में फिर गीत मेरे बिके |
| और मैं क़ीमतें ले के घर आ गया। |
| कल सजा रात आँसू का बाज़ार फिर |
| कल ग़ज़ल-गीत बनकर ढला प्यार फिर, |
| कल सितारों-सी ऊँचाई पाकर भी मैं |
| ढूँढता ही रहा एक आधार फिर, |
| कल मैं दुनिया को पाकर भी रोता रहा |
| आज खो कर स्वयं को तुम्हें पा गया, |
| कल नुमाइश में फिर गीत मेरे बिके |
| और मैं क़ीमतें ले के घर आ गया। |
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