GULZAR POETRY (P-5)


1. आदमी बुलबुला है

आदमी बुलबुला है पानी का
और पानी की बहती सतह पर टूटता भी है, डूबता भी है,
फिर उभरता है, फिर से बहता है,
समंदर निगला सका इसको, तवारीख़ तोड़ पाई है,
वक्त की मौज पर सदा बहता आदमी बुलबुला है पानी का।
25. आज फिर चाँद की पेशानी से
आज फिर चाँद की पेशानी से उठता है धुआँ
आज फिर महकी हुई रात में जलना होगा
आज फिर सीने में उलझी हुई वज़नी साँसें
फट के बस टूट ही जाएँगी, बिखर जाएँगी
आज फिर जागते गुज़रेगी तेरे ख्वाब में रात
आज फिर चाँद की पेशानी से उठता धुआँ

2. मर्सिया

क्या लिए जाते हो तुम कन्धों पे यारो
इस जनाज़े में तो कोई भी नहीं है,
दर्द है कोई, हसरत है, गम है….
मुस्कराहट की अलामत है कोई आह का नुक्ता
और निगाहों की कोई तहरीर आवाज़ का कतरा
कब्र में क्या दफन करने जा रहे हो…….???
सिर्फ मिट्टी है ये मिट्टी ….
मिट्टी को मिट्टी में दफनाते हुए
रोते हो क्यों ?…

3. आँसू
1.
अल्फाज जो उगते, मुरझाते, जलते, बुझते
रहते हैं मेरे चारों तरफ,
अल्फाज़ जो मेरे गिर्द पतंगों की सूरत उड़ते
रहते हैं रात और दिन
इन लफ़्ज़ों के किरदार हैं, इनकी शक्लें हैं,
रंग रूप भी हैं-- और उम्रें भी!
कुछ लफ्ज़ बहुत बीमार हैं, अब चल सकते नहीं,
कुछ लफ्ज़ तो बिस्तरेमर्ग पे हैं,
कुछ लफ्ज़ हैं जिनको चोटें लगती रहती हैं,
मैं पट्टियाँ करता रहता हूँ!
अल्फाज़ कई, हर चार तरफ बस यू हीं
थूकते रहते हैं,
गाली की तरह--
मतलब भी नहीं, मकसद भी नहीं--
कुछ लफ्ज़ हैं मुँह में रखे हुए
चुइंगगम की तरह हम जिनकी जुगाली करते हैं!
लफ़्ज़ों के दाँत नहीं होते, पर काटते हैं,
और काट लें तो फिर उनके जख्म नहीं भरते!
हर रोज मदरसों में 'टीचर' आते है गालें भर भर के,
छः छः घंटे अल्फाज लुटाते रहते हैं,
बरसों के घिसे, बेरंग से, बेआहंग से,
फीके लफ्ज़ कि जिनमे रस भी नहीं,
मानि भी नहीं!
एक भीगा हुआ, छ्ल्का छल्का, वह लफ्ज़ भी है,
जब दर्द छुए तो आँखों में भर आता है
कहने के लिये लब हिलते नहीं,
आँखों से अदा हो जाता है!!
2.
सुना है मिट्टी पानी का अज़ल से एक रिश्ता है,
जड़ें मिट्टी में लगती हैं,
जड़ों में पानी रहता है।
तुम्हारी आँख से आँसू का गिरना था कि दिल
में दर्द भर आया,
ज़रा से बीज से कोंपल निकल आयी!!

जड़े मिट्टी में लगती हैं,
जड़ों में पानी रहता है!!
3.
शीशम अब तक सहमा सा चुपचाप खड़ा है,
भीगा भीगा ठिठुरा ठिठुरा।
बूँदें पत्ता पत्ता कर के,
टप टप करती टूटती हैं तो सिसकी की आवाज
आती है!
बारिश के जाने के बाद भी,
देर तलक टपका रहता है!
तुमको छोड़े देर हुई है--
आँसू अब तक टूट रहे हैं

4. समय

मैं खंडहरों की ज़मीं पे कब से भटक रहा हूं

क़दीम रातों की टूटी क़ब्रों के मैले कुतबे
दिनों की टूटी हुई सलीबें गिरी पड़ी हैं
शफ़क़ की ठंडी चिताओं से राख उड़ रही है
जगह-जगह गुर्ज़ वक़्त के चूर हो गए हैं
जगह-जगह ढेर हो गयी हैं अज़ीम सदियां
मैं खंडहरों की ज़मीं पे कब से भटक रहा हूं

यहीं मुकद्दस हथेलियों से गिरी है मेहंदी
दियों की टूटी हुई लवें ज़ंग खा गयी हैं
यहीं पे माथों की रौशनी जल के बुझ गयी है
सपाट चेहरों के ख़ाली पन्ने खुले हुए हैं
हुरूफ़ आंखों के मिट चुके हैं

मैं खंडहरों की ज़मीं पे कब से भटक रहा हूं
यहीं कहीं ज़िंदगी के मानी गिरे हैं और गिरके खो गए हैं.

5. ईंधन

छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी
हम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थे
आँख लगाकर - कान बनाकर
नाक सजाकर -
पगड़ी वाला, टोपी वाला
मेरा उपला -
तेरा उपला -
अपने-अपने जाने-पहचाने नामों से
उपले थापा करते थे

हँसता-खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकर
गोबर के उपलों पे खेला करता था
रात को आँगन में जब चूल्हा जलता था
हम सारे चूल्हा घेर के बैठे रहते थे
किस उपले की बारी आयी
किसका उपला राख हुआ
वो पंडित था -
इक मुन्ना था -
इक दशरथ था -
बरसों बाद - मैं
श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ
आज की रात इस वक्त के जलते चूल्हे में
इक दोस्त का उपला और गया !

6. खेत के सब्ज़े में

खेत के सब्ज़े में बेसुध सी पड़ी है दुबकी
एक पगडंडी की कुचली हुई अधमुई सी लाश
तेज़ कदमो के तले दर्द से कहराती है
दो किनारो पे जवां सिट्टो के चेहरे तककर
चुप सी रह जाती है ये सोच के बस
यूं मेरी कोख कुचल देते राहगीर अगर
मेरे बेटे भी जवाँ हो गए होते अब तक
मेरी बेटी भी तो बयाहने के काबिल होती

7. दिल में ऐसे ठहर गए हैं ग़म

दिल में ऐसे ठहर गए हैं ग़म
जैसे जंगल में शाम के साये
जाते-जाते सहम के रुक जाएँ
मुडके देखे उदास राहों पर
कैसे बुझते हुए उजालों में
दूर तक धूल ही धूल उडती है

8. इस मोड़ से जाते हैं

इस मोड़ से जाते हैं
कुछ सुस्त कदम रस्ते
कुछ तेज कदम राहें।

पत्थर की हवेली को
शीशे के घरौंदों में
तिनकों के नशेमन तक
इस मोड़ से जाते हैं।

आंधी की तरह उड़ कर
इक राह गुजरती है
शरमाती हुई कोई
कदमों से उतरती है।

इन रेशमी राहों में
इक राह तो वह होगी
तुम तक जो पहुंचती है
इस मोड़ से जाती है।

इक दूर से आती है
पास के पलटती है
इक राह अकेली सी
रुकती है चलती है।

ये सोच के बैठी हूं
इक राह तो वो होगी
तुम तक जो पहुंचती है
इस मोड़ से जाती है।

इस मोड़ से जाते हैं
कुछ सुस्त कदम रस्ते
कुछ तेज कदम राहें।

पत्थर की हवेली को
शीशे के घरौंदों में
तिनकों के नशेमन तक
इस मोड़ से जाते हैं।

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