1. लिबास
मेरे कपड़ों में टंगा
है
तेरा ख़ुश-रंग
लिबास!
घर पे धोता
हूँ हर बार
उसे और सुखा
के फिर से
अपने हाथों से उसे
इस्त्री करता हूँ
मगर
इस्त्री करने से
जाती नहीं शिकनें
उस की
और धोने से
गिले-शिकवों के
चिकते नहीं मिटते!
ज़िंदगी किस क़दर
आसाँ होती
रिश्ते गर होते
लिबास
और बदल लेते
क़मीज़ों की तरह!
2. दिल ढूँढता है
दिल ढूँढता है, फिर
वही फुरसत के
रात दिन
बैठे रहे तसव्वुर-ए-जाना
किये हुए
जाड़ों की नर्म
धुप और आँगन
में लेट कर
आँखों पे खिंच
कर तेरे दामन
के साए को
औंधे पड़े रहे
कभी करवट लिए
हुए
दिल ढूँढता है, फिर
वही फुरसत के
रात दिन
या गर्मियों की रात
जो पूरवाईयाँ चले
ठंडी सफ़ेद चादरों पे
जागे देर तक
तारों को देखते
रहे छत पर
पड़े हुए
दिल ढूँढता है, फिर
वही फुरसत के
रात दिन
बर्फीली सर्दियों में किसी
भी पहाड़ पर
वादी में गूंजती
हुयी, खामोशियाँ सूने
आँखों में भीगे
भीगे से लम्हे
लिए हुए..
दिल ढूँढता है, फिर
वही फुरसत के
रात दिन
3. चार तिनके उठा के
चार तिनके उठा के
जंगल से
एक बाली अनाज
की लेकर
चंद कतरे बिलखते
अश्कों के
चंद फांके बुझे हुए
लब पर
मुट्ठी भर अपने
कब्र की मिट्टी
मुट्ठी भर आरजुओं
का गारा
एक तामीर की लिए
हसरत
तेरा खानाबदोश बेचारा
शहर में दर-ब-दर
भटकता है
तेरा कांधा मिले तो
टेकूं!
4. ख़ुदा
पूरे का पूरा
आकाश घुमा कर
बाज़ी देखी मैंने
काले घर में
सूरज रख के,
तुमने शायद सोचा
था, मेरे सब
मोहरे पिट जायेंगे,
मैंने एक चिराग़
जला कर,
अपना रस्ता खोल लिया.
तुमने एक समन्दर
हाथ में ले
कर, मुझ पर
ठेल दिया।
मैंने नूह की
कश्ती उसके ऊपर
रख दी,
काल चला तुमने
और मेरी जानिब
देखा,
मैंने काल को
तोड़ क़े लम्हा-लम्हा जीना सीख
लिया।
मेरी ख़ुदी को तुमने
चन्द चमत्कारों से
मारना चाहा,
मेरे इक प्यादे
ने तेरा चाँद
का मोहरा मार
लिया
मौत की शह
दे कर तुमने
समझा अब तो
मात हुई,
मैंने जिस्म का ख़ोल
उतार क़े सौंप
दिया,
और रूह बचा
ली,
पूरे-का-पूरा
आकाश घुमा कर
अब तुम देखो
बाज़ी।
5. चाँदघर
कितना अरसा हुआ
कोई उम्मीद जलाये,
कितनी मुद्दत हुयी किसी
कंदील पे जलती
रौशनी रखे ।
चलते फिरते इस सुनसान
हवेली में,
तन्हाई से ठोकर
खा के,
कितनी बार गिरा
हूँ मैं ।
चाँद अगर निकले
तो अब इस
घर में रौशनी
होती है,
वर्ना अँधेरा रहता है!
6. भमीरी
हम सब भाग
रहे थे
रिफ्य़ूजी थे
माँ ने जितने
ज़ेवर थे,
सब पहन लिये
थे।
बाँध लिये थे....
छोटी मुझसे.... छह सालों
की
दूध पिला के,खूब खिलाके
साथ लिया था।
मैने अपनी ऐक
"भमीरी"
और ऐक "लाटू"
पजामे मे उड़स
लिया था।
रात की रात
हम गाँव छोड़कर
भाग रहे थे,रिफ़्यूज़ी थे....
आग धुऐं और
चीख पुकार के
जंगल से गुज़रे
थे सारे
हम सब के
सब घोर धुऐं
मे भाग रहे
थे।
हाथ किसी आँधी
की आँतें
फाड़ रहे थे
आँखें अपने जबड़े
खोले
भौंक रही थीं
माँ ने दौड़ते
दौड़ते
ख़ून की कै
कर दी थी।
जाने कब छोटी
का
मुझसे छूटा हाथ
वहीं छोड़ आया
था
अपना बचपन,लेकिन
मैने सरहद के
सन्नाटों के
सहराओं मे अक्सर
देखा है
एक "भमीरी" अब भी
नाचा करती है
और इक "लाटू" अब
भी घूमा करता
है।
रिफ्य़ूजी
....जीरो लाइन पर
7. हमदम
मोड़ पे देखा
है वह बूढ़ा
सा एक पेड़
कभी?
मेरा वाकिफ है, बहुत
सालों से जानता
हूँ
जब मैं छोटा
था तो इक
आम उड़ाने के
लिए
परली दीवार से कन्धों
पे चढ़ा था
उसके
जाने दुखती हुई किस
शाख से जा
पाँव लगा
धाड़ से फेंक
दिया था मुझे
नीचे उसने
मैंने खुन्नस में बहुत
फेंके थे पत्थर
उस पर
मेरी शादी पे
मुझे याद है
शाखें देकर
मेरी वेदी का
हवन गर्म किया
था उसने
और जब हामला
थी 'बीबा' तो
दोपहर में हर
दिन
मेरी बीवी की
तरफ़ कैरियां फेंकी
थी इसी ने
वक्त के साथ
सभी फूल, सभी
पत्ते गए
तब भी जल
जाता था जब
मुन्ने से कहती
'बीबा'
'हाँ, उसी पेड़
से आया है
तू, पेड़ का
फल है'
अब भी जल
जाता हूँ, जब
मोड़ गुजरते में
कभी
खांसकर कहता है,
'क्यों, सर के
सभी बाल गए?'
सुबह से काट
रहे हैं वह
कमेटी वाले
मोड़ तक जाने
की हिम्मत नहीं
होती मुझको
9. मैं कायनात में
मैं कायनात में सय्यारों
में भटकता था
.....
धुएँ में ,धूल
में उलझी हुई
किरण की तरह
मैं इस जमीं
पे भटकता रहा
हूँ सदियों तक
गिरा है वक्त
से कट कर
जो लम्हा
उसकी तरह ............
वतन मिला तो
गली के लिए
भटकता रहा
गली में घर
का निशाँ तलाश
करता रहा बरसों
तुम्हारी रूह में
अब ,जिस्म में
भटकता हूँ !
लबों से चूम
लो ,आँखों से
थाम लो मुझको
तुम्हारी कोख से
जनमूँ तो फ़िर
पनाह मिले !!
10. सितारे
लटके हुए हैं
सितारे लटके हुए
हैं तागों से
आस्माँ पर
चमकती चिंगारियाँ-सी चकरा
रहीं आँखों की
पुतलियों में
नज़र पे चिपके
हुए हैं कुछ
चिकने-चिकने से
रोशनी के धब्बे
जो पलकें मूँदूँ तो
चुभने लगती हैं
रोशनी की सफ़ेद
किरचें
मुझे मेरे मखमली
अँधेरों की गोद
में डाल दो
उठाकर
चटकती आँखों पे घुप्प
अँधेरों के फाए
रख दो
यह रोशनी का उबलता
लावा न अन्धा
कर दे ।
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