1. किताबें
किताबें झाँकती हैं बंद अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से ताकती हैं महीनों अब मुलाक़ातें नहीं होती
जो शामें इनकी सोहबत मे कटा करती थी
अब अक्सर गुज़र जाती हैं कंप्यूटर के पर्दों पर
ऐसे में बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें
उन्हें अब नींद मे चलने की आदत हो गयी है
जो क़दरें वो सुनाती थी कि जिनके सेल कभी मरते नहीं थे
वो क़दरें अब नज़र आती नहीं हैं घर में
जो रिश्ते वो सुनाती थी वो सारे उधड़े उधड़े हैं
कोई सफ़हा पलटता हूँ तो एक सिसकी सुनाई देती है
कई लफ्ज़ो के माने गिर पड़े हैं
बिना पत्तो के सूखे तुंड लगते हैं वो सब अल्फ़ाज़
जिन पर अब कोई माइने नहीं उगते
ज़बां पर जो ज़ायक़ा आता था जो सफ़हा पलटने का
अब उंगली क्लिक करने से
बस एक झपकी गुज़रती है
बहुत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है पर्दो पर
किताबो से जो ज़ाती राब्ता था कट गया है
कभी सीने पे रख के लेट जाते थे
कभी गोदी मे लेते थे
कभी घुटनो को अपनी रिहल की सूरत बना कर
नीम सजदे मे पढ़ा करते थे छुते थे जबीं
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइन्दा भी
मगर वो जो किताबो में मिला करते थे
सूखे फूल और महके हुए रुक़्क़े
किताबें मांगने, गिरने, उठाने के बहाने जो रिश्ते बनते थे
अब उनका क्या होगा?
वो शायद अब नहीं होंगे!!
2. ये गोल सिक्के
हर एक पुश्त की औकात उसकी लिखी है
बचाके रखना तुम..
ये गोल सिक्के, दमकते हुए खनकते हुए
किसी पे मोहरा हुआ एक राजा का चेहरा
किसी पे मोहरी हुई एक रानी की तस्वीर
हर इक की पुश्त पे औक़ात उसकी लिखी है
ये हाथों-हाथ लियॆ जाते है जहाँ जायें
बचाके रखना तुम अपनी खुदी के चेहरे को
ये मिट गया तो गिनाएंगे खोटे सिक्कों में
3. सुबह से शाम हुई
सुबह से शाम हुई और हिरन मुझको छलावे देता
सारे जंगल में परेशां किये घूम रहा है अब तक
उसकी गर्दन के बहुत पास से गुजरे हैं कई तीर मेरे
वो भी अब उतना ही हुश्यार है जितना मैं हूँ
इक झलक देके जो गम होता है वो पेड़ों में,
मैं वहां पहुचूं तो टीले पे, कभी चश्मे के उस पार नज़र आता है
वो नज़र रखता है मुझपर
मैं उसे आँख से ओझल नहीं होने देता
कौन दौड़ाये हुए है किसको?
कौन अब किसका शिकारी है पता ही नहीं चलता
सुबह उतरा था मैं जंगल में
तो सोचा था कि इस शोख़ हिरन को
नेज़े की नोक पे परचम की तरह तान के मैं शहर में दाखिल हूंगा
दिन मगर ढलने लगा है
दिल में इक खौफ़ सा बैठ रहा है
के बालाखिर ये हिरन ही
मुझे सींगों पर उठाये हुए इक ग़ार में दाखिल होगा
4. फ़सादात
1.
उफुक फलांग के उमरा हुजूम लोगों का
कोई मीनारे से उतरा, कोई मुंडेरों से
किसी ने सीढियां लपकीं, हटाई दीवारें--
कोई अजाँ से उठा है, कोई जरस सुन कर!
गुस्सीली आँखों में फुंकारते हवाले लिये,
गली के मोड़ पे आकर हुए हैं जमा सभी!
हर इक के हाथ में पत्थर हैं कुछ अकीदों के
खुदा कि जात को संगसार करने आये हैं!!
2.
मौजजा कोई भी उस शब ना हुआ--
जितने भी लोग थे उस रोज इबादतगाह में,
सब के होठों पर दुआ थी,
और आँखों में चरागाँ था यकीं का
ये खुदा का घर है,
जलजले तोड़ नहीं सकते इसे, आग जला सकती नहीं!
सैकड़ों मौजजों कि सब ने हिकायात सुनी थीं
सैकड़ों नामों से उन सब ने पुकारा उसको ,
गैब से कोई भी आवाज नहीं आई किसी की,
ना खुदा कि -- ना पुलिस कि!!
सब के सब भूने गए आग में, और भस्म हुये ।
मौजजा कोई भी उस शब् ना हुआ!!
3.
मौजजे होते हैं,-- ये बात सुना करते थे!
वक्त आने पे मगर--
आग से फूल उगे, और ना जमीं से कोई दरिया
फूटा
ना समंदर से किसी मौज ने फेंका आँचल,
ना फलक से कोई कश्ती उतरी!
आजमाइश की थी काल रात खुदाओं के लिये
काल मेरे शहर में घर उनके जलाये सब ने!!
4.
अपनी मर्जी से तो मजहब भी नहीं उसने चुना था,
उसका मज़हब था जो माँ बाप से ही उसने
विरासत में लिया था---
अपने माँ बाप चुने कोई ये मुमकिन ही कहाँ है
मुल्क में मर्ज़ी थी उसकी न वतन उसकी रजा से
वो तो कुल नौ ही बरस का था उसे क्यों चुनकर,
फिर्कादाराना फसादात ने कल क़त्ल किया--!! 5.
आग का पेट बड़ा है!
आग को चाहिए हर लहजा चबाने के लिये
खुश्क करारे पत्ते,
आग कर लेती है तिनकों पे गुजारा लेकिन--
आशियानों को निगलती है निवालों की तरह,
आग को सब्ज हरी टहनियाँ अच्छी नहीं लगतीं,
ढूंढती है, कि कहीं सूखे हुये जिस्म मिलें!
उसको जंगल कि हवा रास बहुत है फिर भी,
अब गरीबों कि कई बस्तियों पर देखा है हमला करते,
आग अब मंदिरों-मस्जिद की गजा खाती है!
लोगों के हाथों में अब आग नहीं--
आग के हाथों में कुछ लोग हैं अब
6.
शहर में आदमी कोई भी नहीं क़त्ल हुआ,
नाम थे लोगों के जो, क़त्ल हुये।
सर नहीं काटा, किसी ने भी, कहीं पर कोई--
लोगों ने टोपियाँ काटी थीं कि जिनमें सर थे!
और ये बहता हुआ सुर्ख लहू है जो सड़क पर,
ज़बह होती हुई आवाजों की गर्दन से गिरा था
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