1. मुझको भी तरकीब
सिखा कोई, यार
जुलाहे
मुझको भी तरकीब
सिखा कोई यार
जुलाहे
अक्सर तुझको देखा है
कि ताना बुनते
जब कोई तागा
टूट गया या
ख़तम हुआ
फिर से बाँध
के
और सिरा कोई
जोड़ के उसमें
आगे बुनने लगते हो
तेरे इस ताने
में लेकिन
इक भी गाँठ
गिरह बुनतर की
देख नहीं सकता
है कोई
मैंने तो इक
बार बुना था
एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी
गिरहें
साफ़ नज़र आती
हैं मेरे यार
जुलाहे
2. शहतूत की शाख़
पे
शहतूत की शाख़
पे बैठा कोई
बुनता है रेशम
के तागे
लम्हा-लम्हा खोल रहा
है
पत्ता-पत्ता बीन रहा
है
एक-एक सांस
बजा कर सुनता
है सौदाई
एक-एक सांस
को खोल के
अपने तन पर
लिपटाता जाता है
अपनी ही साँसों
का क़ैदी
रेशम का यह
शायर इक दिन
अपने ही तागों
में घुट कर
मर जाएगा
3. मुझसे इक नज़्म
का वादा है
मुझसे इक नज़्म
का वादा है,
मिलेगी मुझको
डूबती नब्ज़ों में,
जब दर्द को
नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा
लिए चाँद,
उफ़क़ पर पहुंचे
दिन अभी पानी
में हो,
रात किनारे के क़रीब
न अँधेरा, न उजाला
हो,
यह न रात,
न दिन
ज़िस्म जब ख़त्म
हो
और रूह को
जब सांस आए
मुझसे इक नज़्म
का वादा है
मिलेगी मुझको
4. देखो आहिस्ता चलो
देखो, आहिस्ता चलो और
भी आहिस्ता ज़रा
देखना, सोच सँभल
कर ज़रा पाँव
रखना
ज़ोर से बज
न उठे पैरों
की आवाज़ कहीं
कांच के ख़्वाब
हैं बिखरे हुए
तन्हाई में
ख़्वाब टूटे न
कोई जाग न
जाए देखो
जाग जाएगा कोई ख़्वाब
तो मर जाएगा
5. वो जो शायर
था
वो जो शायर
था चुप सा
रहता था
बहकी-बहकी सी
बातें करता था
आँखें कानों पे रख
के सुनता था
गूंगी ख़ामोशियों की आवाज़ें
जमा करता था
चाँद के साए
गीली-गीली सी
नूर की बूंदें
ओक़ में भर
के खड़खड़ाता था
रूखे-रूखे से
रात के पत्ते
वक़्त के इस
घनेरे जंगल में
कच्चे-पक्के से लम्हे
चुनता था
हाँ वही वो
अजीब सा शायर
रात को उठ
के कोहनियों के
बल
चाँद की ठोडी
चूमा करता था
चाँद से गिर
के मर गया
है वो
लोग कहते हैं
ख़ुदकुशी की है
6. अलाव
रात भर सर्द
हवा चलती रही
रात भर हमने
अलाव तापा
मैंने माज़ी से कई
ख़ुश्क सी शाख़ें
काटीं
तुमने भी गुज़रे
हुए लम्हों के
पत्ते तोड़े
मैंने जेबों से निकालीं
सभी सूखी नज़्में
तुमने भी हाथों
से मुरझाए हुए
ख़त खोले
अपनी इन आँखों
से मैंने कई
मांजे तोड़े
और हाथों से कई
बासी लकीरें फेंकीं
तुमने पलकों पे नमी
सूख गई थी
सो गिरा दी
रात भर जो
मिला उगते बदन
पर हमको
काट के डाल
दिया जलते अलाव
में उसे
रात भर फूंकों
से हर लौ
को जगाये रखा
और दो जिस्मों
के ईंधन को
जलाये रखा
रात भर बुझते
हुए रिश्ते को
तापा हमने
7. वक़्त
मैं उड़ते हुए पंछियों
को डराता हुआ
कुचलता हुआ घास
की कलगियाँ
गिराता हुआ गर्दनें
इन दरख़्तों की,
छुपता हुआ
जिनके पीछे से
निकला चला जा
रहा था वह
सूरज
त'आक़ुब में था
उसके मैं
गिरफ़्तार करने गया
था उसे
जो ले के
मेरी उम्र का
एक दिन भागता
जा रहा था
8. अभी न पर्दा
गिराओ
अभी न पर्दा
गिराओ, ठहरो कि
दास्ताँ आगे और
भी है
अभी न पर्दा
गिराओ, ठहरो
अभी तो टूटी
है कच्ची मिट्टी,
अभी तो बस
जिस्म ही गिरे
हैं
अभी तो किरदार
ही बुझे है,
अभी सुलगते हैं रूह
के ग़म
अभी धड़कतें है दर्द
दिल के
अभी तो एहसास
जी रहा है
यह लौ बचा
लो जो थक
के किरदार की
हथेली से गिर
पड़ी है
यह लौ बचा
लो यहीं से
उठेगी जुस्तजू फिर
बगुला बन कर
यहीं से उठेगा
कोई किरदार फिर
इसी रोशनी को
ले कर
कहीं तो अंजाम-ए-जुस्तजू
के सिरे मिलेंगे
अभी न पर्दा
गिराओ, ठहरो
9. बस्ता फ़ेंक के
बस्ता फ़ेंक के लोची
भागा रोशनआरा बाग़
की जानिब
चिल्लाता:
'चल गुड्डी चल'
पक्के जामुन टपकेंगे'
आँगन की रस्सी
से माँ ने
कपड़े खोले
और तंदूर पे लाके
टीन की चादर
डाली
सारे दिन के
सूखे पापड़
लच्छी ने लिपटा
ई चादर
'बच गई रब्बा'
किया कराया धुल
जाना था'
ख़ैरु ने अपने
खेतों की सूखी
मिट्टी
झुर्रियों वाले हाथ
में ले कर
भीगी-भीगी आँखों
से फिर ऊपर
देखा
झूम के फिर
उट्ठे हैं बादल
टूट के फिर
मेंह बरसेगा
10. गोल फूला हुआ
गोल फूला हुआ
ग़ुब्बारा थक कर
एक नुकीली पहाड़ी यूँ
जाके टिका है
जैसे ऊँगली पे मदारी
ने उठा रक्खा
हो गोला
फूँक से ठेलो
तो पानी में
उतर जाएगा
भक से फट
जाएगा फूला हुआ
सूरज का ग़ुब्बारा
छन-से बुझ
जाएगा इक और
दहकता हुआ दिन
0 Comments